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Human rights is becoming a culture in the era of Nation-State concept....now a person leads to behaviour .one is governed by his/her conventional culture and other one is administered by human rights culture in the nation -state frame.so this resonance gives a space to discuss human being in the frame of human rights instead of his conventional culture...this blog will discuss all aspects of life regarding Human rigts

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नए साल की जिंदगी

Posted On: 29 Dec, 2013 Junction Forum,Hindi Sahitya में

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पौधे से न जाने कब ,
जिंदगी दरख्त बन गयी ,
किसी के लिए यह ,
ओस कि बूंद सी रही ,
तो किसी के लिए ,
मदहोश सी मिलती  रही
कोई आकर घोसला ,
अपना बना गया ,
कोई मिल कर ,
होसला ही बढ़ा गया ,
किसी को हसी मिली ,
किसी कि सांस खिली ,
कोई जिया ही देखकर ,
कोई आया दिल भेद कर ,
सभी में अपने लिए ,
तोड़ने , मोड़ने , छूने ,
छाया पाने की ललक दिखी ,
किसी ने फूल समझा ,
तो किसी ने कलम बना ,
अपनी ही इबारत लिखी ,
सभी को आलोक मिला ,
पर आलोक का गिला ,
अँधेरे से सब डरते रहे ,
मौत से ही मरते रहे ,
कोई नहीं दिखा आलोक में ,
जोड़ी बनती है परलोक में ,
आलोक पूरा हुआ अँधेरे से ,
रात पूरी होगी सबेरे से ,
आइये चलते रहे दरख्त ,
बनने की इस कहानी में ,
फूल पत्ती शाखो से ,
महकते रहे जवानी में ………………….अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप सभी को जिंदगी के मायने समझते हुए एक नए कल की शुभ कामनाये प्रेषित करता है …………

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yatindranathchaturvedi के द्वारा
January 1, 2014

||WISH YOU A VERY HAPPY NEW YEAR-2014||

yogi sarswat के द्वारा
January 1, 2014

कोई आकर घोसला , अपना बना गया , कोई मिल कर , होसला ही बढ़ा गया , किसी को हसी मिली , किसी कि सांस खिली , कोई जिया ही देखकर , कोई आया दिल भेद कर , सभी में अपने लिए , तोड़ने , मोड़ने , छूने , छाया पाने की ललक दिखी , किसी ने फूल समझा , तो किसी ने कलम बना , अपनी ही इबारत लिखी , सभी को आलोक मिला , पर आलोक का गिला , अँधेरे से सब डरते रहे , मौत से ही मरते रहे , बहुत सुन्दर !

abhishek shukla के द्वारा
January 1, 2014

खूबसूरत……नव वर्ष मंगलमय हो..


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