all indian rights organization

Human rights is becoming a culture in the era of Nation-State concept....now a person leads to behaviour .one is governed by his/her conventional culture and other one is administered by human rights culture in the nation -state frame.so this resonance gives a space to discuss human being in the frame of human rights instead of his conventional culture...this blog will discuss all aspects of life regarding Human rigts

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क्या आप नहीं रुकेंगे ????? आपको आ बैल मुझे मार पसंद है !!!!!!!!!!!!!!!!! घर फूंक तमाशा देखो का मतलब समझना चाहते है !!!!!!!!!!!!!!!! क्या जब तक भारत पूरा मिट नहीं जायेगा तब तक देश कि बहने हिंदी चीनी भाई बहन का खेल खेल कर राखी खरीदती रहेंगी …………….क्या आप को वसुधैव कुतुम्बुकम का सपना पूरा करना है भले पूरा देश चीन का गुलाम हो जाये ???????? माँ का मतलब समझने के लिए माँ को मारना जरुरी है क्योकि बिना मरे स्वर्ग नहीं दिखाई देता …….पर क्या ऐसे चीन अधिकृत भारतमे आप चीनी राखी के बल पर कितने दिन चीनीयों के आगे बहन बनी रह पाएंगी ??????????????? सोचिये सोचिये ????????? यानि हिंदी चीनी को चीनी में घोल कर पी लीजिये ताकि महंगी होती चीनी कुछ सस्ती हो जाये …….तो कहिये हीनी में हिंदी राखी यानि देश कि इज्जत को लुटने से बचाना !!!!!!!!!!!!! समझ गए ना ( ये व्यंग्य समझ कर पढ़ा जाये ) सटीक और सार्थक लेखन

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काफी लोगो का मानना है कि मई इतना कूट भाषा में लिख रहा हूँ कि पर मुझे लगता है कि मैंने स्पष्ट रूप से लिखा है कि देश में महाभारत कालीन समय से छक्को का अधिपत्य रहा है जिसके कारण भीष्म पितामह जैसे महँ लोगो को जीवन से हाथ धोना पड़ा ..........और इस बार तो देश ६६वे साल में अपनी स्वतंत्रता के है यानि देश के पास दो दो छक्के है .यानि एक एक दो नही ग्यारह होते है तो देश में छक्के ही छक्के है और वैसे भी भारत के पास छक्के का विश्व रिकार्ड है .............और इस बार स्वतंत्रता दिवस भी दो छक्को के साथ है ..............तो देश के लिए है ना ख़ुशी बात ..........जब छक्के होंगे ...तभी पूरा खुलापन होगा ....और छक्के कोई नंगई कर सकते है .........और उनको किसी को लुटने में कोई दर नही लगता तो है न देश के लिए ख़ुशी बात ................हमको स्वतंत्रता ही तो चाहिए ................पर इस बार उसको मानना है दो छक्को के साथ .........................

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आलोक जी, यदि आप यह मानते हैं कि कोई भी व्यवसाय घाटे में नहीं चलाया जा सकता तो आप पेट्रोल की कीमतों की बढोतरी को उचित मानेंगे. पेट्रोल, डीजल और गैस पर कंपनियों को जो घाटा हो रहा है वो हजारों करोड की सीमा में है. कंपनियां विदेश से कच्चा तेल विदेशी मुद्रा में मंगाते हैं और उसके लिये बैंकों से कर्जा लेते हैं. राजनेता टेक्स के नाम पर हर राज्य में करोडों रुपये पेट्रोल डीजल और गैस पर कमा रहे हैं परन्तु टैक्स कम नहीं करते. साथ ही वोट बैंक बनाये रखने के लिये पेट्रोल कंपनियों को दाम नहीं बढाने देते जिससे पेट्रोलियम कंपनियां दिवालियेपन की कगार तक आने लगी हैं. उधर हमारा मिडिया भी हर बात में आग लगा कर जनता को उकसाता है जबकि उसका रोल एक साफ़ पारदर्शी तस्वीर दिखाने का है. आशा है आप मेरी मंशा समझेंगे.

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